सोमवार, 10 अगस्त 2026

गजलें राठी साहब की



**बलबीर सिंह राठी जी की गजल**
दरमियां नफ़रत का दरिया है अभी तक दोस्तो ! 
आदमी पहुँचेगा कैसे आदमी तक दोस्तो !

कैसे मिलते अपनी राहों में सवेरों के निशान रात से आए थे चल कर रात ही तक दोस्तो !

सब के सब सहमे खड़े हैं रास्तों के आर-पार 

इस तरह पहुँचेगा कोई कब किसी तक दोस्तो!

हम जिधर निकले वहीं दीवार आई सामने अपनी आज़ादी रही दीवार ही तक दोस्तो !

इन अँधेरों के लिए कुछ हम भी ज़िम्मेदार हैं क्यों धधक कर जल नहीं पाए अभी तक दोस्तो !

देखना है कौन रह पाएगा अब साबित क़दम 
ये सफ़र है तीरगी से रौशनी तक दोस्तो !

हर क़दम पड़ता है अपना ठीक मंज़िल की तरफ़ 
कौन कहता है सफ़र है गुमरही तक दोस्तो!

**बलबीर सिंह राठी जी की गजल**
जो भी मुझसे जुड़ी हुई होगी 
वो कहानी अजीब-सी होगी

उसका चर्चा गली-गली होगा 
दास्तां जो नई-नई होगी

तुम जिधर से गुज़र गए होगे 
चाँदनी-सी बिखर गई होगी

क्या ख़बर थी तुम्हारे जाने पर 
ज़िन्दगी यूँ घुटी-घुटी होगी

कल जहाँ पर घना अँधेरा था 
क्या वहाँ आज रौशनी होगी

राहरौ राह में खड़े होंगे 
और मंज़िल तरस रही होगी

किसने दी है सदा सवेरों को 
कौन कहता है रौशनी होगी

***बलबीर सिंह राठी जी की गजल***
एहसासात की बस्ती में जब हर जानिब इक सन्नाटा था 
मैं आवाज़ों के जंगल में तब जाने क्या ढूँढ़ रहा था

जिन राहों से अपने दिल का हर क़िस्सा मन्सूब रहा है 
अब तो ये भी याद नहीं है उन राहों का क़िस्सा क्या था

आज उसी के अफ़सानों का महफिल -महफ़िल चर्चा होगा 
कल चौराहे पर तन्हा जो शख़्स बहुत ख़ामोश खड़ा था

यूँ जीवन रस कब देता है फिर से अपने ज़ख़्म कुरेदो 
तुमने आख़िर क्या सोचा था दर्द से क्यों संन्यास लिया था

ऐसी कोई बात नहीं थी उन राहों से लौट भी आते 
लेकिन उन राहों पे किसी ने कुछ दिन अपना साथ दिया था

इस नगरी में लगभग सबने एक तरह से चोटें खाई 
लेकिन ज़ख़्मों को सहलाने का सबका अंदाज़ जुदा था

तुम इन बेगानी राहों में आख़िर किसको ढूँढ़ रहे हो 
 वो तो कब का लौट चुका है कल जो तुम्हारे साथ चला था


***बलबीर सिंह राठी जी की गजल**
जब ये लगते थे ज़लज़ले अपने 
तब तो तेवर ही और थे अपने

किसने पटकी है तीरगी दर पर 
वो उजाले किधर गए अपने

एक आलम को नाप सकते हैं 
कोई देखे तो हौसले अपने

किसने सूरज पे कर लिया क़ब्ज़ा 
क्यों अँधेरे ही रह गए अपने

हम ये तूफ़ान अब कहाँ पटकें 
जज़्ब होंगे कहाँ गिले अपने

अपने रहबर जो थे सो थे लेकिन 
हमसफ़र भी किधर गए अपने

कितना सीधा जवाब था उनका 
कितने टेढ़े सवाल थे अपने


***बलबीर सिंह राठी जी की गजल***
यूँ तो उस तस्वीर का हर रंग काफ़ी शोख़ था 
ज़हन में जो अक्स उभरा वो मगर धुँधला रहा

देर तक इक शख़्स चलती भीड़ को तकता रहा 
जाने फिर क्या जी में आई उस में शामिल हो गया

यूँ तो वो बादे-सबा का सिर्फ़ इक झोंका ही था 
फिर भी मेरे दिल में इक तूफ़ान बरपा कर गया

काश! कोई शक्ल दे सकता मैं उसको दोस्तो ! 
मुद्दतों जो अक्स मेरे ज़हन पर छाया रहा

कोई भी मंज़िल हमारी आख़िरी मंज़िल न थी 
ज़िन्दगी भर फ़ासिलों का इम्तिहां होता रहा

सोचता हूँ जिन सवालों का नहीं कोई जवाब 
उम्र भर मैं उन सवालों ही में क्यों उलझा रहा

**बलबीर सिंह राठी जी की गजल**
कुछ न कुछ तो ज़िन्दगी दिलचस्प हो दोस्तो! तूफ़ान ही बरपा करो

फिर भटक जाओ कहीं ऐसा न हो 
राह को अच्छी तरह पहचान लो

इन अँधेरी घाटियों की वुसअतें 
कुछ नहीं है साथियो! बढ़ते चलो

गर यही रफ़्तार का आलम रहा 
ये सफ़र कैसे कटेगा दोस्तो !

मंज़िलें ख़ुद राह में आ जाएँगी
फ़ासिलों का इम्तिहां लेते चलो

हर तरफ़ चारागरों की भीड़ है 
अपने ज़ख़्मों को अभी ढाँपे रहो

*बलबीर सिंह राठी जी की गजल* done 
कैसे उनको सुनाता मैं वो सानिहा 
जिसका एक-एक लफ़्ज़ उनसे मन्सूब था

रात का सिलसिला टूटता ही नहीं 
तुमने सूरज छुपा के कहाँ रख दिया

आज कोई ख़लिश अपने सीनों में है 
कल कोई ख़्वाब-सा अपनी आँखों में था

वो चला था मिरे साथ कुछ दूर तक 
जाने फिर रास्ते में वो क्यों रह गया

अपने सीनों में थे सुब्ह के वलवले 
रात का बोझ अपनी निगाहों में था

दूसरों से अलग हो के वो उम्र भर 
जाने क्यों अपने अन्दर सिमटता रहा

उन पहाड़ों की ज़िद तोड़ने के लिए 
कोई चारा न था ज़लज़लों के सिवा



**
*बलबीर सिंह राठी जी की गजल*done 
वो जो फिरते थे आफताब लिए 
क्यों अँधेरे न मिट सके उनसे

ग़म ने घेरा तो साथ छोड़ गए 
अपने हमदर्द कैसे-कैसे थे

राहे-मंजिल के मरहले मत पूछ 
लौट आए हैं लोग रस्ते से

कैसे मंजिल की कर सकोगे तलाश 
हर कदम पर मिलेंगे चौराहे

बात लम्बी थी जब शिकस्तों की 
हम भला कैसे मुख्तसर करते

यूँ अँधेरे निगल गए जिनको 
वो उजाले भी क्या उजाले थे

आप चाहें तो रौशनी कर लें 
हम तो मानूस हैं अँघरों के
-


**/
*बलबीर राठी जी की गजल*
कोई मंज़िल भी नहीं है कोई रस्ता भी नहीं और सब महवे-सफ़र हैं कोई रुकता भी नहीं

हर तरफ़ बेरंग-सी गहरी उदासी का जमाव एक रंगी ख़्वाब जो नज़रों से हटता भी नहीं

किस तरह थामे हुए हैं ख़ुद को इस बस्ती के लोग 
कोई मुतवाज़िन नहीं है और फिसलता भी नहीं

इक मुसल्सल-सी ये सइए-रायगाना काविशें 
एक पत्थर-सा ये मंज़र जो पिघलता भी नहीं

बेसबब सी टीस दिल में मुस्तिक़ल होती हुई जज़्ब-ए-बेबाक जो दिल में उतरता भी नहीं

हर तरफ़ ये धूप हर दम तेज़तर होती हुई मोम का इक शह लेकिन जो पिघलता भी नहीं

*****
*बलबीर सिंह राठी जी की गजल*done 
क्या करोगे ये पूछ कर मुझसे 
कैसे बिछड़ा वो हमसफ़र मुझसे

बस्ती-बस्ती का राज़दां हूँ मै 
आश्ना है नगर-नगर मुझसे

अपने सारे ही राज़ अफ़्शां कर 
अब तो खुलकर ही बात कर मुझसे

कर भरोसा कि अपनी बस्ती मे 
कौन है और मोतबर मुझसे

मुझको तूफ़ां का कोई ख़ौफ़ नही 
आश्ना है लहर-लहर मुझसे

जिनके ख़्वाबों का मैं ही मर्कज़ था 
अब चुराते हैं वो नज़र मुझसे

मुझसे निस्बत हैं इतने हंगामे 
लोग फिर भी हैं बेखबर मुझसे

ये अँधेरों के दाइरे तौबा
रात होगी न यूँ बसर मुझसे

कैसे मिलता है मंज़िलों का सुराग़
काश पूछे ये राहबर मुझसे

चोटियों से फिसल न जाऊँ कहीं 
वादियों की न बात कर मुझसे

****
*बलबीर सिंह राठी जी की गजल*done 
या तो गहरे जंगलों में गुम रहो 
या कहीं से कोई रस्ता ढूँढ़ लो

तोड़ सकते हो तो घेरे तोड़ दो 
वरना पहले की तरह सिकुड़े रहो

ऐ अँधेरों के भयानक दाइरो ! 
दूर हो जाओ या मुझको घेर लो

एहतियातन मैं बता भी दूँ, इधर 
बर्फ का दरिया भी है बचकर चलो

सिर्फ़ कोहरा है ये हरगिज़ सच नहीं 
बन्द कमरों से निकलकर देख लो

दिन ब दिन बढ़ती हुई मजबूरियाँ 
यूँ भला कब तक चलेगा दोस्तो !

कौन किस के वास्ते लुटता रहा 
सारे पहलू देख लो फिर तय करो

****
*बलबीर सिंह राठी जी की गजल*to be 
 शहर बदला हुआ-सा लगता है 
हर कोई औपरा-सा लगता है

मुझको अक्सर खुद अपने अन्दर ही 
कुछ भटकता हुआ-सा लगता है

जाने क्या बात है कि घर मुझको 
रोज़ गिरता हुआ-सा लगता है

मुझको हर शख़्स अपनी बस्ती का 
खुद से रूठा हुआ-सा लगता है

दर्द से यूँ निजात कब होगी 
वक़्त ठहरा हुआ-सा लगता है

ज़ख़्म खाए हुए ज़माना हुआ 
दर्द अब तक नया-सा लगता है

दास्तानें हैं खूब सबकी मगर 
अपना क़िस्सा जुदा-सा लगता है



*

सोमवार, 8 अक्टूबर 2012


बलबीर सिंह राठी जी की एक गजल 
जिन्दगी आखिर हमें किन रास्तों पर ले चली ,
लोग अपनों ही से अब होने  लागे हैं अजनबी| 
वो बनाएगा जहाँ को और बेहतर किस तरह 
आदमीयत ही का दुश्मन हो गया है आदमी |
लोग बिकने के लिए खुद ही खिलोने बां गये 
काश!वो सोचें की उनकी ऐसी हालत क्यों हुयी |
प्यार के लफ्जों से हो महरूम जब हर गुफ्तगू 
फिर निभेगी किस तरह  एक दूसरे से दोस्ती |
मैकदे में ही पिलाई है किसी ने दोस्तों 
मैकशों ने वर्ना ये नफरत कहाँ से सीख ली |
रोज घटती जा रही है इस की अजमत इन दिनों 
आओ देखें कितना बाकी बच गया है आदमी |
जब किसी में कोई हमदर्दी का जज्बा ही नहीं 
बात कोई क्यूं करे फिर दूसरों के दर्द की |
अब खुशी की मेरे दिल में कैसे गुन्जाईस रहे 
जब जहाँ भर के ग़मों की इसमें दुनिया बस चुकी |
कौन इस अंदाज में कहता है " राठी" के सिवा 
लोग फिर क्यों पूछते है ये गजल किसने  कही |

रविवार, 30 सितंबर 2012

बलबीर सिंह राठी जी की एक गजल 
दुःख आया है बनकर अपना ,
देखे कोई मुकद्दर अपना |
सब आबाद नज़ारे उनके ,
और हर वीरान मंजर अपना |
औरों का दुःख धीरे धीरे ,
दिल में उतरा बनकर अपना |
नजरें हैं ख्वाबों से खाली ,
जेहन भी बिल्कुल बंजर अपना |
चेहरा भूख की एक अलामत ,

दिल है बस इक पत्थर अपना |
सुख की इक छोटी सी गागर ,
दुःख का पूरा सागर अपना |
दिल में रस का इक दरिया है ,
फिर जीवन बंजर अपना |
अब नगमों का वक्त नहीं है ,
रख दो साज उठा कर अपना |
खुद को क्यूं हल्का करते हो .,
किस्सा रोज सुनाकर अपना |
"राठी "

BALBIR SINGH RATHEE JI KEE EK GAJAL

बलबीर राठी जी की एक गजल 
कैसी लाचारी का आलम है यहाँ चारों तरफ 
फैलता जता है जहरीला धुआं चारों तरफ 
जिन पहाड़ों को बना आये थे हम आतिश फशां
अब उन्हीं से जलजले होंगे रवां चारों तरफ 
ऐसे मंजर में हमें जिद्द है किसी गुलजार की 
एक सहरा और खाली आस्मां चारों तरफ 
हो सका तो मैं बहारें लेके जाऊँगा वहां 
सूखे पेड़ों की कतारें हैं जहां चारों तरफ 
सिर्फ मैं ही बां गया हूँ अब निशाना जब्र का 

मेरी जानिब तन गयी है हर कमां चारों तरफ
मंजिलों को ढूँढने फिर खुद निकल आएंगे लोग
फैलने तो दो हमारी दास्ताँ चारों तरफ
"बलबीर सिंह राठी"



शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

कोई आयेगा उसको यूं तो सब हंस कर मिलेंगे

बलबीर राठी जी की एक गजल ------------
कोई आयेगा उसको यूं तो सब हंस कर मिलेंगे 
मेरी बस्ती में लेकिन सारे सौदागर मिलेंगे 
न जाओ तुम वहां आँखों में उजले ख्वाब लेकर 
जो ख्वाबों को निगल जाते हैं वो अजगर मिलेंगे 
यही खुशफहमियां मुझ को यहाँ तक खींच लाई 
तुम्हारे शहर में अब तक वही मंजर मिलेंगे 
उदास आंगन में जिनके रात आकर बैठ जाये 
अंधेरों के घने साये उन्हें दिन भर मिलेंगे 
न मंजिल की खबर जिनको न राहों का
 पता है
जिधर भी जाओगे तुम को वही रहबर मिलेंगे
बराबर चलते चलते लोग मिल जाते हैं अक्सर
मग़र जो फासिला रखेंगे वो क्यूकर मिलेंगे
अगर वो साथ हों तो खुद संवर जाती हैं राहें
सफ़र में तुम को ऐसे लोग भी अक्सर मिलेंगे
जो सच को झूठ कर दें झूठ को सच बना दें
मिरी बस्ती में तुमको ऐसे जादूगर मिलेंगे
हमारे शहर में सच बोलना मुहतात होकर
यहाँ तो हर तरफ बस झूठ के लश्कर मिलेंगे
जरा से फ़ायदे के वास्ते जो जहर दे दे
मिरी बस्ती में ऐसे भी चारागर मिलेंगे
चले आना किसी दिन उसको अपना घर समझ कर
तुम्हारे सब पुराने ख्वाब मेरे घर मिलेंगे
ये मुमकिन है कि "राठी" जी किसी दिन मिल भी जाएँ
मग़र हम सोचते हैं उनसे क्या कहकर मिलेंगे

हम को दी हैं उदासियाँ किसने

बलबीर राठी जी की एक गजल
हम को दी हैं उदासियाँ किसने 
ऐसी साजिश,रची कहाँ किसने 
ला के रख दी ये दूरियां किसने 
मेरा लेना है इम्तिहान किसने 
जो बगावत की बात करते थे 
कर दिया उनको बेजबां किसने 
किसने तौबा उड़न से कर ली 
फिर बनाया है आशियाँ किसने 
सानिहा देखकर तो सब चुप थे 
फिर ये किस्सा किया बयां किसने
क्या बताएं ये फांसला यारो
रख दिया अपने दरमियाँ किसने
इन फजाओं में इतना जहरीला
भर दिया इस कदर धुआं किसने
जब तलब थी मसर्रतोंकी मुझे
दर पे रख दी उदासीयाँ किसने
जो अभी तक कहीं पढी न सुनी
वो सुनायी है दास्ताँ किसने
अपनी खातिर बाना दिया 'राठी"
इतना दोजख नुमा जहाँ किसने