बलबीर राठी जी की एक गजल
कैसी लाचारी का आलम है यहाँ चारों तरफ
फैलता जता है जहरीला धुआं चारों तरफ
जिन पहाड़ों को बना आये थे हम आतिश फशां
अब उन्हीं से जलजले होंगे रवां चारों तरफ
ऐसे मंजर में हमें जिद्द है किसी गुलजार की
एक सहरा और खाली आस्मां चारों तरफ
हो सका तो मैं बहारें लेके जाऊँगा वहां
सूखे पेड़ों की कतारें हैं जहां चारों तरफ
सिर्फ मैं ही बां गया हूँ अब निशाना जब्र का
कैसी लाचारी का आलम है यहाँ चारों तरफ
फैलता जता है जहरीला धुआं चारों तरफ
जिन पहाड़ों को बना आये थे हम आतिश फशां
अब उन्हीं से जलजले होंगे रवां चारों तरफ
ऐसे मंजर में हमें जिद्द है किसी गुलजार की
एक सहरा और खाली आस्मां चारों तरफ
हो सका तो मैं बहारें लेके जाऊँगा वहां
सूखे पेड़ों की कतारें हैं जहां चारों तरफ
सिर्फ मैं ही बां गया हूँ अब निशाना जब्र का
मेरी जानिब तन गयी है हर कमां चारों तरफ
मंजिलों को ढूँढने फिर खुद निकल आएंगे लोग
फैलने तो दो हमारी दास्ताँ चारों तरफ
"बलबीर सिंह राठी"
मंजिलों को ढूँढने फिर खुद निकल आएंगे लोग
फैलने तो दो हमारी दास्ताँ चारों तरफ
"बलबीर सिंह राठी"
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