शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

कोई आयेगा उसको यूं तो सब हंस कर मिलेंगे

बलबीर राठी जी की एक गजल ------------
कोई आयेगा उसको यूं तो सब हंस कर मिलेंगे 
मेरी बस्ती में लेकिन सारे सौदागर मिलेंगे 
न जाओ तुम वहां आँखों में उजले ख्वाब लेकर 
जो ख्वाबों को निगल जाते हैं वो अजगर मिलेंगे 
यही खुशफहमियां मुझ को यहाँ तक खींच लाई 
तुम्हारे शहर में अब तक वही मंजर मिलेंगे 
उदास आंगन में जिनके रात आकर बैठ जाये 
अंधेरों के घने साये उन्हें दिन भर मिलेंगे 
न मंजिल की खबर जिनको न राहों का
 पता है
जिधर भी जाओगे तुम को वही रहबर मिलेंगे
बराबर चलते चलते लोग मिल जाते हैं अक्सर
मग़र जो फासिला रखेंगे वो क्यूकर मिलेंगे
अगर वो साथ हों तो खुद संवर जाती हैं राहें
सफ़र में तुम को ऐसे लोग भी अक्सर मिलेंगे
जो सच को झूठ कर दें झूठ को सच बना दें
मिरी बस्ती में तुमको ऐसे जादूगर मिलेंगे
हमारे शहर में सच बोलना मुहतात होकर
यहाँ तो हर तरफ बस झूठ के लश्कर मिलेंगे
जरा से फ़ायदे के वास्ते जो जहर दे दे
मिरी बस्ती में ऐसे भी चारागर मिलेंगे
चले आना किसी दिन उसको अपना घर समझ कर
तुम्हारे सब पुराने ख्वाब मेरे घर मिलेंगे
ये मुमकिन है कि "राठी" जी किसी दिन मिल भी जाएँ
मग़र हम सोचते हैं उनसे क्या कहकर मिलेंगे

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