बलबीर राठी जी की एक गजल
हम को दी हैं उदासियाँ किसने
ऐसी साजिश,रची कहाँ किसने
ला के रख दी ये दूरियां किसने
मेरा लेना है इम्तिहान किसने
जो बगावत की बात करते थे
कर दिया उनको बेजबां किसने
किसने तौबा उड़न से कर ली
फिर बनाया है आशियाँ किसने
सानिहा देखकर तो सब चुप थे
हम को दी हैं उदासियाँ किसने
ऐसी साजिश,रची कहाँ किसने
ला के रख दी ये दूरियां किसने
मेरा लेना है इम्तिहान किसने
जो बगावत की बात करते थे
कर दिया उनको बेजबां किसने
किसने तौबा उड़न से कर ली
फिर बनाया है आशियाँ किसने
सानिहा देखकर तो सब चुप थे
फिर ये किस्सा किया बयां किसने
क्या बताएं ये फांसला यारो
रख दिया अपने दरमियाँ किसने
इन फजाओं में इतना जहरीला
भर दिया इस कदर धुआं किसने
जब तलब थी मसर्रतोंकी मुझे
दर पे रख दी उदासीयाँ किसने
जो अभी तक कहीं पढी न सुनी
वो सुनायी है दास्ताँ किसने
अपनी खातिर बाना दिया 'राठी"
इतना दोजख नुमा जहाँ किसने
क्या बताएं ये फांसला यारो
रख दिया अपने दरमियाँ किसने
इन फजाओं में इतना जहरीला
भर दिया इस कदर धुआं किसने
जब तलब थी मसर्रतोंकी मुझे
दर पे रख दी उदासीयाँ किसने
जो अभी तक कहीं पढी न सुनी
वो सुनायी है दास्ताँ किसने
अपनी खातिर बाना दिया 'राठी"
इतना दोजख नुमा जहाँ किसने
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