सोमवार, 8 अक्टूबर 2012


बलबीर सिंह राठी जी की एक गजल 
जिन्दगी आखिर हमें किन रास्तों पर ले चली ,
लोग अपनों ही से अब होने  लागे हैं अजनबी| 
वो बनाएगा जहाँ को और बेहतर किस तरह 
आदमीयत ही का दुश्मन हो गया है आदमी |
लोग बिकने के लिए खुद ही खिलोने बां गये 
काश!वो सोचें की उनकी ऐसी हालत क्यों हुयी |
प्यार के लफ्जों से हो महरूम जब हर गुफ्तगू 
फिर निभेगी किस तरह  एक दूसरे से दोस्ती |
मैकदे में ही पिलाई है किसी ने दोस्तों 
मैकशों ने वर्ना ये नफरत कहाँ से सीख ली |
रोज घटती जा रही है इस की अजमत इन दिनों 
आओ देखें कितना बाकी बच गया है आदमी |
जब किसी में कोई हमदर्दी का जज्बा ही नहीं 
बात कोई क्यूं करे फिर दूसरों के दर्द की |
अब खुशी की मेरे दिल में कैसे गुन्जाईस रहे 
जब जहाँ भर के ग़मों की इसमें दुनिया बस चुकी |
कौन इस अंदाज में कहता है " राठी" के सिवा 
लोग फिर क्यों पूछते है ये गजल किसने  कही |

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